PAPER ID:IJIM/Vol. 10 (IX)January/45-49/9
AUTHOR:मनोज कुमार [i] डॉ. नीतू सिंह [ii]
TITLE :शैक्षणिक महाविद्यालयों के पुस्तकालयों में प्रशासनिक व्यवस्था तथा कार्यरत पुस्तकालय कर्मियों के कार्य विश्लेषण का संक्षिप्त मूल्यांकन
ABSTRACT:भारत एक विकासशील देश है इसलिये भारतीय विश्वविद्यालयों से आशा की जाती हे कि वे अपने नागरिकों को ऐसा बनाये जो अपने देश की प्रगति एवं सेवा के प्रति वचनबद्ध हों। विश्वविद्यालय में शिक्षण स्नातक, स्नातकोत्तर तथा व्यावसायिक स्तर पर होता है। विश्वविद्यालयों में महाविद्यालयों से अलग कार्य जो होता है वह अनुसंधान कार्य। विश्वविद्यालय के कार्य विश्वविद्यालय ग्रन्थालय के बिना सम्पूर्ण नहीं हो सकते क्योंकि विश्वविद्यालय ग्रन्थालय विश्वविद्यालय का एक अभिन्न अंग होता है। यह विश्वविद्यालय का दिल होता है। जिस प्रकार दिल रहित व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता उसी प्रकार विश्वविद्यालय ग्रंथालय के अभाव में विश्वविद्यालय का भी कोई अस्तित्व नहीं होता। ऐसे विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी मान्यता नहीं देता। विश्वविद्यालय की बहुआयामी गतिविधियों के कारण पाठकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये विश्वविद्यालय ग्रंथालय की उपयोगिता में आज बहुत वृद्धि हो गई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में केवल 20 विश्वविद्यालय थे, जो आज लगभग 1000 से अधिक हो गये हैं। पुस्तकालय को शैक्षणिक संस्थाओं की धुरी माना जाता है, जो संस्थाओं के समग्र शैक्षिक प्रयासों में सम्पूरक एवं अनुपूरक के बतौर भूमिका निभाते हैं। पुस्तकालयों के माध्यम से मानव अपने दृष्टिकोणों एवं अनुभवों तथा स्वप्नों के पूर्वजो के प्रमाण पुश्ट एवं अनुभूत सत्यों को जानने समझने के अवसर, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाता है। यह एक ऐसा गुरू है जो बिना किसी प्रताड़ना के आत्मीयता से ज्ञान के सोपान पर उन्नत करता है। ग्रंथालय अतीत की कड़ी होते हैं और साथ ही अतीत को वर्तमान से सम्बद्ध करते हैं। भविष्य का निर्माण करने में सोपान भी है और वर्तमान से भविष्य की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करते हैं।
KEYWORDS: भारत उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, शैक्षिक पुस्तकालय ज्ञान संचार अनुसंधान, पुस्तकालय की भूमिका भारत /2047
Click here to download Fulltext