प्रेमचंद से प्रसाद तक छायावादी युग में सामाजिक यथार्थऔर काव्य कल्पना

PAPER ID:IJIM/Vol. 10 (VIII)December/42-46/7

AUTHOR: डॉ. लक्ष्मी

TITLE: प्रेमचंद से प्रसाद तक छायावादी युग में सामाजिक यथार्थ और काव्य कल्पना

ABSTRACT: हिंदी साहित्य का छायावादी युग (1918 से 1936) साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण काल रहा है। इस युग में एक ओर कवियों ने कल्पना, भावुकता और प्रकृति-सौंदर्य को स्वर दिया, वहीं दूसरी ओर गद्यकारों और विचारशील रचनाकारों ने सामाजिक यथार्थ की ओर ध्यान केंद्रित किया। इस प्रकार छायावादी साहित्य में व्यक्ति की आत्मानुभूति के साथ-साथ समाज की वास्तविक स्थितियाँ भी अभिव्यक्त हुईं। प्रेमचंद ने कथा-साहित्य के माध्यम से किसानों की दरिद्रता, स्त्रियों की दयनीय स्थिति, वर्ग-संघर्ष और सामाजिक शोषण जैसे प्रश्नों को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया। उनका उपन्यास गोदान इस यथार्थवाद का सर्वोत्तम उदाहरण है। वे मानते थे कि साहित्य का उद्देश्य केवल सौंदर्य-बोध कराना नहीं, बल्कि समाज को जागृत करना भी है। इसके विपरीत जयशंकर प्रसाद ने अपनी काव्य-कल्पना के माध्यम से मानवीय संवेदना और जीवन-दर्शन का गहन चित्रण किया। कामायनी जैसी रचना ने न केवल छायावादी काव्य को उच्चता दी, बल्कि मानव जीवन की जटिलताओं को प्रतीकात्मक और दार्शनिक रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार प्रेमचंद का यथार्थवाद और प्रसाद की काव्य-कल्पना दोनों ही साहित्य को समृद्ध करते हैं। छायावादी युग का यह संतुलन साहित्य में समाज और संवेदना के बीच सेतु स्थापित करता है, जो हिंदी साहित्य की विशिष्ट पहचान है।

KEYWORDS : छायावाद, सामाजिक यथार्थ, काव्य कल्पना, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, हिंदी साहित्य, यथार्थवाद, भावुकता।

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