PAPER ID:IJIM/Vol. 10 (IX)January/50-54/10
AUTHOR:डॉ. लक्ष्मी
TITLE :छायावादी काव्य में प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं का अंतर्संबंध
ABSTRACT:छायावाद हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण युग है जिसमें आत्मानुभूति, भावुकता और रहस्यात्मकता की प्रधानता दिखाई देती है। इस युग के कवियों ने प्रकृति को केवल बाह्य जगत के सौंदर्य का साधन न मानकर मानवीय संवेदनाओं का प्रतिबिंब माना। प्रकृति के माध्यम से कवि ने अपने हृदय की वेदना, करुणा, प्रेम और आशा को अभिव्यक्त किया। छायावाद के चार प्रमुख कविजयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मासभी ने प्रकृति और मानव-जीवन के अंतर्संबंध को अलग-अलग दृष्टियों से प्रस्तुत किया। प्रसाद के काव्य में प्रकृति रहस्य और सौंदर्य का माध्यम बनती है, निराला ने अपनी पीड़ा और विद्रोही चेतना को प्रकृति से जोड़ा, पंत ने प्रकृति को प्रेम और सौंदर्य की अभिव्यक्ति माना, जबकि महादेवी वर्मा ने प्रकृति के माध्यम से करुणा और आत्मानुभूति का विस्तार किया। इस प्रकार छायावादी काव्य में प्रकृति मानवीय भावनाओं का दर्पण बनकर उपस्थित होती है। यह शोध-पत्र इसी तथ्य का विश्लेषण करता है कि छायावादी काव्य में प्रकृति और मानव-जीवन के सुख-दुःख, वेदना और करुणा, प्रेम और आशा का गहरा सामंजस्य है। प्रकृति केवल बाहरी दृश्य नहीं बल्कि कवि की आंतरिक संवेदनाओं का जीवंत प्रतीक है।
KEYWORDS:छायावाद, प्रकृति, संवेदनाएँ, आत्मानुभूति, करुणा, प्रेम, रहस्यवाद।